अर्धविरामों का अनंत चक्र
वन के अंतस्तल में घात लगाए बैठे हैं शिकारी,
मौन को घृणा के बोझ में तब्दील करने को।
कोलाहल का यह 'लोकतंत्र' अनवरत,
शांति के इस कानन में आग लगा रहा है।
निर्बलों को दबोचते वे वाचाल जल-जंतु,
और अवशेषों की ताक में बैठे वे खूंखार शार्क।
जीवन रूपी इस दलदल में फँसे हुए,
व्यर्थ के विवादों की पतवार हम चलाते हैं।
यहाँ पूर्णविराम नहीं, इस दौड़ का कोई अंत नहीं,
बस अर्धविरामों की एक अटूट श्रृंखला है।
संदेह, महत्त्वाकांक्षा और देह की तृष्णा का यह घेरा,
वहीं समाप्त होता है, जहाँ से इसकी शुरुआत हुई थी।
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