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अर्धविरामों का अनंत चक्र

वन के अंतस्तल में घात लगाए बैठे हैं शिकारी, मौन को घृणा के बोझ में तब्दील करने को। कोलाहल का यह 'लोकतंत्र' अनवरत, शांति के इस कानन में आग लगा रहा है। निर्बलों को दबोचते वे वाचाल जल-जंतु, और अवशेषों की ताक में बैठे वे खूंखार शार्क। जीवन रूपी इस दलदल में फँसे हुए, व्यर्थ के विवादों की पतवार हम चलाते हैं। यहाँ पूर्णविराम नहीं, इस दौड़ का कोई अंत नहीं, बस अर्धविरामों की एक अटूट श्रृंखला है। संदेह, महत्त्वाकांक्षा और देह की तृष्णा का यह घेरा, वहीं समाप्त होता है, जहाँ से इसकी शुरुआत हुई थी।

जमा हुआ खज़ाना (The Frozen Treasury)--सामाजिक टिप्पणी

धरातल फरवरी की वह एक हड्डी कंपा देने वाली दोपहर थी—मिनेसोटा की वह सर्दी जहाँ हवा किसी आरी की तरह शरीर को चीर देती है। यह जमे हुए खज़ानों और उससे भी कहीं अधिक ठंडे दिलों की ज़मीन थी। वह लड़की ढीली-ढाली जींस और एक पतले ट्रैकस्यूट में कांपती हुई लड़खड़ाकर चल रही थी। उसकी सांसें धुएं के गुबार की तरह निकल रही थीं और पल भर में सलेटी आसमान में ओझल हो जाती थीं। एजेंसी ने उसका किराया देने से मना कर दिया था, और देखते ही देखते वह सड़क पर आ गई। जब पुलिस अधिकारी आए, तो कोई बातचीत नहीं हुई, बस बाहर निकलने का एक बेरुखा आदेश मिला। उसके जीवन का अधिकांश हिस्सा—उसकी माँ की तस्वीर, उसका भारी कोट, उसका आत्मसम्मान—उन बंद दरवाजों के पीछे ही रह गया। अब वह अकेली थी और उसके सामने थी एक बेरहम, शून्य से नीचे की कड़ कड़ाती ठंड। वह बर्फ के ढेरों के बीच बिना किसी लक्ष्य के चलती रही, उसके पैर की उंगलियां बर्फ के टुकड़ों की तरह सुन्न पड़ गई थीं। वह उस सफेद, बर्फ़ीले रेगिस्तान में किसी साये की तरह लग रही थी। इस जगह किसी को किसी की परवाह नहीं थी। खिड़कियों पर पाला जमा था, जिसमें उन लोगों के चेहरे छिपे थे जो पैसा कमाने क...